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कैसे कटा 21 से 55 तक का यह सफ़र,पता ही नहीं चला ।
क्या पाया, क्या खोया,क्यों खोया,पता ही नहीं चला !
बीता बचपन,गई जवानी कब आया बुढ़ापा, पता ही नहीं चला ।
कल बेटे थे, कब ससुर हो गये, पता ही नहीं चला !
कब पापा से नानु एवं दादु बन गये, पता ही नहीं चला ।
कोई कहता सठिया गये, कोई कहता छा गये, क्या सच है, पता ही नहीं चला !
पहले माँ बाप की चली, फिर बीवी की चली, फिर चली बच्चों की, अपनी कब चली, पता ही नहीं चला !
बीवी कहती अब तो समझ जाओ, क्या समझूँ, क्या न समझूँ, न जाने क्यों, पता ही नहीं चला !
दिल कहता जवान हूँ मैं, उम्र कहती है नादान हूँ मैं, इस चक्कर में कब घुटनें घिस गये, पता ही नहीं चला !
झड़ गये बाल, लटक गये गाल, लग गया चश्मा, कब बदली यह सूरत पता ही नहीं चला !
समय बदला, मैं बदला बदल गई मित्र- मंडली भी कितने छूट गये, कितने रह गये मित्र, पता ही नही चला ।
कल तक अठखेलियाँ करते थे मित्रों के साथ, कब सीनियर सिटिज़न की लाइन में आ गये, पता ही नहीं चला !
बहु, जमाईं, नाते, पोते, खुशियाँ आई, कब मुस्कुराई उदास ज़िन्दगी, पता ही नहीं चला ।
जी भर के जी लो प्यारे फिर न कहना कि .. “मुझे पता ही नहीं चला” ।
अकराज नबी कुरेशी,
झुंझुनू , राजस्थान