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एमओयू में मर्डर को मृत्यु का कारण मानने पर बीमा दावा खारिज नहीं कर सकती कंपनी
बीमा कंपनी पर लगाई 55 हजार रुपए की शास्ति, जो राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा करवानी होगी
झुंझुनूं, (6 जून 2026)। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग झुंझुनूं के अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेंद्र कुमार सैनी की पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को मृतक किसान सदस्य की नामित माँ को 5 लाख रुपये की बीमा राशि देने का आदेश दिया है। उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष एवं पीठासीन अधिकारी मनोज मील ने सहकारी समिति के माध्यम से बीमा सुरक्षा लेने वाले मृतक किसान के संबंधित क्लेम राशि का भुगतान करने के मामले में बीमा कंपनी के रवैये को अनुचित कार्य व्यवहार, अनुचित व्यापार प्रथा एवं सेवा में कमी मानते हुए बीमा कम्पनी पर विशेष रूप से 55 हजार रुपये की शास्ति भी लगाई है। यह शास्ती राशि राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा करवा कर जमा की रसीद उपभोक्ता आयोग के कार्यालय में प्रस्तुत करनी होगी। ऐसा करने में बीमा कम्पनी के असफल रहने पर आयोग के रीडर को राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष जयपुर की ओर से आयोग के रीडर को इजराय कार्यवाही करने के लिए अधिकृत किया गया है।
मामले के अनुसार रघुनाथपुरा निवासी अनुप देरवाला ग्राम सेवा सहकारी समिति का सदस्य था तथा समूह व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना के तहत 5 लाख रुपये के लिए बीमित था। 3 अक्टूबर 2016 को हुए एक हिंसक झगड़े में उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी माँ सुमित्रा बेनीवाल ने बीमा दावा प्रस्तुत किया।
बीमा कंपनी ने दावा खारिज करते हुए कहा कि घटना की सूचना उसे 78 दिन बाद दी गई, जबकि पॉलिसी की शर्तों के अनुसार सूचना तत्काल दी जानी चाहिए थी। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि मृतक स्वयं आपराधिक मंशा से घटना में शामिल था, इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। बीमा कम्पनी से क्लेम दावा ख़ारिज होने पर मृतक किसान अनूप की माँ सुमित्रा देवी ने उपभोक्ता आयोग में बीमा कम्पनी के खिलाफ परिवाद प्रस्तुत किया।
सुनवाई के दौरान उपभोक्ता आयोग ने पाया कि मृतक के परिजनों ने घटना के कुछ दिनों बाद ही संबंधित बैंक एवं सहकारी समिति को सूचना दे दी थी। यदि दावा प्रपत्र या सूचना बीमा कंपनी तक विलंब से पहुंची, तो इसके लिए परिवादी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। आयोग ने स्पष्ट कहा कि केवल 78 दिन की देरी को आधार बनाकर दावा खारिज करना न्यायोचित नहीं है, विशेषकर तब जब पुलिस जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य अभिलेखों से मृत्यु का तथ्य स्थापित हो चुका हो।
उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने निर्णय में उल्लेख किया कि बीमा कंपनी और राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के बीच हुए एमओयू में हत्या जैसी परिस्थितियों में भी बीमित सदस्य के उत्तराधिकारियों को 5 लाख रुपये की बीमा राशि देय है। इसके बावजूद बीमा कंपनी ने अपने दायित्व से बचने का प्रयास किया, जो उपभोक्ता संरक्षण कानून की भावना के विपरीत है।
उपभोक्ता आयोग ने यह भी टिप्पणी की है कि कंपनी ने क्लेम दावा निस्तारण में सकारात्मक रुख नहीं अपनाया। आयोग ने इसे अनुचित कार्य-व्यवहार, अनुचित व्यापार प्रथा तथा सेवा में गंभीर कमी माना।
उपभोक्ता आयोग के आदेश के अनुसार बीमा कंपनी को परिवाद दायर करने की तिथि से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित 5 लाख रुपये की बीमा राशि अदा करनी होगी। साथ ही मानसिक संताप के लिए 45 हजार रुपये तथा वाद व्यय के रूप में 5,500 रुपये भी देने होंगे।
इसके अतिरिक्त उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी पर 55 हजार रुपये की शास्ति लगाते हुए यह राशि राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष जयपुर में जमा कराने का निर्देश दिया है। आदेश की निर्धारित अवधि में पालना नहीं होने पर देय राशि पर 12.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।
इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश गया है कि बीमा कंपनियां केवल तकनीकी आधारों से वैध दावों को अस्वीकार नहीं कर सकती है। उपभोक्ता संरक्षण कानून की भावना के अनुरूप बीमाधारकों एवं उनके परिजनों के अधिकारों की रक्षा करना बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी है तथा इसके उल्लंघन पर उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि पंचायत राज के चुनाव में मृतक अनूप की चुनाव को लेकर पारिवारिक झगड़े में मृत्यु हुई और उसके चाचा व चाचा के पुत्र की भी मृत्यु हुई थी।