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आरबीआई गाइडलाइन की अनदेखी बैंक को पड़ी भारी,

नियमानुसार प्री-क्लोजर राशि नहीं वसूल सकते बैंक

झुंझुनूं, (12 जून  2026)। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग‌ अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेंद्र कुमार सैनी ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) सीकर के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए ऋण खाते के प्री- क्लोजर पर वसूले गए 14,978 रुपये को अवैध ठहराया है। ऋण की बकाया राशि 13345 रूपये से ऋण खाता बंद होना था, उसी खाते को बंद करने के नाम पर 14978 रूपये प्री-क्लोजर चार्ज वसुला गया।

एसबीआई बैंक सीकर के प्रबंधक ने परिवादी को बताया कि ऋण की बकाया राशि 13345 रूपये है, लेकिन बैंक ने रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के नियम को भी अनदेखा कर 28323 रूपये वसूल लिए। उपभोक्ता आयोग ने बैंक को उक्त राशि ब्याज सहित लौटाने, उपभोक्ता को मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना के लिए 55 हजार रुपये मुआवजा तथा 7,500 रुपये वाद व्यय के रूप में भुगतान करने के आदेश दिए हैं। साथ ही बैंक पर 25 हजार रुपये की विशेष शास्ति भी लगाई गई है।

मामले के अनुसार नवलगढ़ क्षेत्र निवासी सुभाषचंद्र ने एसबीआई सीकर से लिए गए ऋण का शेष बकाया चुकाकर ऋण खाता बंद करवाने के लिए बैंक से संपर्क किया। परिवादी का आरोप था कि बैंक कर्मचारियों ने उसे बकाया राशि 28,323 रुपये बताई और उसके बचत खाते से यह राशि काटकर ऋण खाता बंद कर दिया। बाद में खाते का विवरण देखने पर उसे पता चला कि वास्तविक बकाया केवल 13,345 रुपये था, जबकि 14,978 रुपये प्री-क्लोजर अथवा प्री-पेमेंट पेनल्टी के नाम पर अतिरिक्त वसूल लिए गए।

परिवादी ने बैंक अधिकारियों से कई बार शिकायत कर राशि वापस लौटाने की मांग की, लेकिन कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उसने जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद प्रस्तुत किया।

सुनवाई के दौरान बैंक ने दावा किया कि ऋण अनुबंध की शर्तों के अनुसार प्री-पेमेंट चार्ज वसूला गया था। हालांकि आयोग ने पाया कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं कि व्यक्तिगत ऋणों के फोरक्लोजर अथवा समय पूर्व भुगतान पर बैंक किसी प्रकार का अतिरिक्त प्री-क्लोजर चार्ज नहीं वसूल सकते। इसके बावजूद बैंक द्वारा उपभोक्ता से राशि वसूलना आरबीआई की गाइडलाइन के विपरीत है।

आयोग ने अपने निर्णय में कहा कि बैंक ने आरबीआई के निर्देशों की अनदेखी करते हुए उपभोक्ता से अवैध रूप से राशि वसूली तथा शिकायत के बावजूद उसका समाधान नहीं किया। आयोग ने इसे सेवा में कमी, अनुचित व्यापार व्यवहार तथा उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन माना।

आयोग ने बैंक को आदेश दिया कि वह प्री-क्लोजर चार्ज के रूप में वसूले गए 14,978 रुपये परिवादी को 3 मार्च 2025 से भुगतान की तिथि तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाए। साथ ही मानसिक एवं शारीरिक कष्ट के लिए 55,000 रुपये तथा वाद व्यय के रूप में 7,500 रुपये का भुगतान भी करे।

मामले को गंभीर मानते हुए आयोग ने बैंक पर 25,000 रुपये की विशेष शास्ति भी लगाई है, जिसे राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराया जाएगा। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक प्रबंधन चाहें तो उपभोक्ता को हुई क्षति तथा शास्ति की राशि के लिए जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों से वसूली कर सकता है।

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