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झुंझुनूं, (19 दिसम्बर 2025)।जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच संतुलन साधते हुए चिड़ावा कस्बे की होनहार बेटी लक्ष्मी, जो स्वयं एक बेटी की मां हैं, ने राजस्थान न्यायिक सेवा (RJS) परीक्षा में प्रदेश स्तर पर 16वीं रैंक प्राप्त कर एक प्रेरक मिसाल कायम की है। उनकी इस उपलब्धि ने यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ संकल्प, अनुशासन और आत्मविश्वास के आगे कोई भी परिस्थिति बाधा नहीं बन सकती।
राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा शुक्रवार को घोषित परिणामों के साथ ही लक्ष्मी की सफलता की खबर से चिड़ावा सहित पूरे झुंझुनूं अंचल में हर्ष की लहर दौड़ गई। उनकी यह सफलता न केवल पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संघर्षरत महिलाओं के लिए आशा का संदेश है, बल्कि उन युवतियों के लिए भी प्रेरणास्रोत है, जो सपनों और परिस्थितियों के बीच झूल रही हैं।
विधि सत्संग संस्था के महेंद्र कुमार सैनी ने बताया कि लक्ष्मी ने यह सफलता अंचल में गुरुदेव महावीर सिंह यादव द्वारा स्थापित विधि सेवाओं की सुदृढ़ परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अर्जित की है। यह उपलब्धि क्षेत्र में न्यायिक सेवाओं के प्रति बढ़ते रुझान और सकारात्मक शैक्षणिक वातावरण का प्रमाण है।
लक्ष्मी के पिता जितेंद्र सिंह विद्यालय में व्याख्याता हैं, जबकि माता सुदेश गृहिणी हैं। परिवार से मिले संस्कार, शिक्षा के प्रति गहरी निष्ठा और सतत प्रोत्साहन ने लक्ष्मी को कठिन परिस्थितियों में भी लक्ष्य पर केंद्रित रखा। मां बनने के बाद भी उन्होंने अध्ययन और पारिवारिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाते हुए सीमित संसाधनों में यह बड़ी सफलता हासिल की।
अपनी सफलता का श्रेय देते हुए लक्ष्मी ने अपने पति कुणाल कुल्हाड़, पिता जितेंद्र सिंह, परिवारजनों, विधि सत्संग संस्था, आरजेएस चंद्रशेखर पारीक एवं महेंद्र सैनी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह सफर आसान नहीं था, लेकिन परिवार और गुरुजनों के सहयोग तथा ईश्वर की कृपा से हर चुनौती को पार कर पाई।”
युवाओं और विशेष रूप से महिलाओं को संदेश देते हुए लक्ष्मी ने कहा कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत निरंतर हो तो सफलता निश्चित है। उन्होंने कहा, “मां होना मेरी कमजोरी नहीं, बल्कि मेरी सबसे बड़ी ताकत बना।”
विधि सत्संग संस्था, चूरू के महेंद्र सैनी ने लक्ष्मी की सफलता पर हर्ष जताते हुए कहा कि उनकी यह उपलब्धि क्षेत्र की बेटियों और माताओं दोनों के लिए प्रेरणादायक है और यह सिद्ध करती है कि छोटे कस्बों से निकलकर भी बड़े सपनों को साकार किया जा सकता है।
निस्संदेह, चिड़ावा की लक्ष्मी की यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, संतुलन और सफलता की प्रेरक कहानी बनकर याद रखी जाएगी।