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चिड़ावा, (23 नवंबर 2024)। समय, स्थान एवं पूंजी पर विशेष निर्भरता से आजीविका चलाने को आवश्यक मानने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है किसान सुरेश पुत्र प्रभाती राम की यह कहानी जिनके द्वारा एक सुझाव से प्रेरित होकर आजीविका हेतु नए आयाम स्थापित किए गए । रामकृष्ण जयदयाल डालमिया सेवा संस्थान से जुड़े प्रगतिशील किसान सुरेश निवासी भुकाना ग्राम बताते हैं कि वह विगत कई वर्षों से अपने पूर्वजों की तर्ज पर परंपरागत खेती करते रहे हैं जिसके अंतर्गत उनको वांछित उत्पादन भी प्राप्त नहीं होता था और रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं फफूंदी नाशकों के प्रयोग फलस्वरुप मिट्टी की उत्पादन क्षमता भी दिन-प्रतिदिन घटती जा रही थी। उन्होंने बताया कि जब यह समस्या उन्होंने तकरीबन डेढ़ वर्ष पहले संस्थान के क्षेत्रीय अधिकारी अजय बलवदा को बताई तब उनके द्वारा मिट्टी की उत्पादकता को ध्यान में रखते हुए जैविक तरीके से खेती करने की राय दी गई , इसके बाद संस्थान की सहायता से वह जैविक कृषि उत्पाद प्रमाणीकरण संस्था राष्ट्रीय जैविक और प्राकृतिक खेती केंद्र द्वारा संचालित योजना से जुड़े व उनके द्वारा परंपरागत फसलों को छोड़कर जैविक तरीके से सब्जी उत्पादन की शुरुवात कर नजदीकी मंडी मे ले जाने की पहल की गई, परंतु अचानक से रासायनिक पेस्टिसाइड का प्रयोग बंद करने से उत्पादन की ठहराव क्षमता पर असर हुआ और मंडी तक ले जाने में वाहन लागत इत्यादि के चलते वांछित लाभ भी प्राप्त नहीं हुआ । सुरेश जी बताते हैं कि एक दिन संस्थान के कृषि एवं वानिकी समन्वयक शुभेन्द्र भट्ट द्वारा उनके खेत पर भ्रमण के दौरान पाया गया कि उनका खेत उनके निवास स्थान से नजदीक एवं सड़क के एकदम पास है जिससे उनके द्वारा मुझे अपने ही निवास स्थान पर उत्पादन बेचने की सलाह दी गई, जिसको कि मैंने तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर उत्पादन को बेचना शुरू कर दिया। आज सुरेश जी संस्थान के अधिकारियों की मदद से देसी गौ- आधारित उत्पादों के माध्यम से पूर्णतया जैविक उत्पादन कर सब्जियों की बिक्री करते हैं उनके अनुसार रोज की लगभग 2 से 3 हजार ₹ की बिक्री कर घर खर्च सुचारू रूप से चलाया जा रहा हैं। शुरुआत में सुरेश जी द्वारा केवल डेढ़ बीघा पर जैविक तरीके से सब्जी उत्पादन शुरू किया गया था आज यह क्षेत्रफल बढ़कर 5 बीघा कर लिया है सुरेश जी आज सुझाव, तकनीकी एवं आर्थिक मदद हेतु संस्थान के अधिकारियों का धन्यवाद करते हैं।