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इस बार के लोकसभा चुनाव में सत्ता पक्ष की चार सौ पार की मुराद पुरी नहीं हुई जिसे पाने के लिये हर तरह के चुनाव के दौरान प्रयोग किये गये दावपेंच आम जनता ने नकार दिया। चुनाव में लोकसभा की 543 सीट में सत्ता पक्ष एनडीए को 292 तो इंडिया गठबंधन को 234, अन्य के खाते में 17 सीट गई। चुनाव में इस बार भाजपा पहले के चुनाव से कम सीट 240 पाकर सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन तो गई पर सपष्ट बहुमत से दूर रहने के कारण अकेले सरकार गठित नहीं कर सकती जब कि वहीं कांग्रेस को पहले चुनाव से ज्यादा सीट मिली है। जो 99 है। पूर्व हुये लोकसभा चुनाव में भाजपा स्पष्ट बहुमत से ज्यादा सीट लाकर स्वयं के बलबुते पर केन्द्र में सरकार बनाने में सफल रही जबकि इस बार सत्ता की कुंजी इसके सहयोगी दल जदयू एवं टीडीपी के पास है। इनके सहयोग के बिना भाजपा केन्द्र में सरकार नहीं बना सकती। यदि किसी कारणवश ये सहयोगी दल भाजपा से अलग हो जाते है तो केन्द्र में भाजपा को अपने दम पर सरकार बना पाना मुश्किल होगा। इस चुनाव में भाजपा को डबल इंजन की सरकार वाले राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा एवं बिहार से पूर्व में आई सीट से भी काफी कम सीट मिली है। स्वयं वाराणसी सीट से चुनावी मतगणना के शुरूवाती दौर से कई चरणों तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय से पीछे चलते रहे, अंत में वे जीत तो हासिल कर लिये पर जीत का अंतराल पहले से काफी कम रहा। उनके मंत्रीमंडल के स्मृति इरानी, आर के सिंह सहित 19 मंत्री चुनाव हार गये । अमेठी से पूर्व चुनाव में राहुल गांधी को हराने के बाद स्मृति इरानी को आंतरिक अहंकार हो गया था जो इस चुनाव में कांग्रेस के एक साधारण कार्यकर्ता से हार का सामना करना पड़ा। जिससे इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कद पहले से कम हुआ है । इस चुनाव में प्रधानमंत्री द्वारा संबोधित घमंडिया गठबंधन को देश की आवाम ने पहले से ज्यादा बहुमत दे दिया एवं सत्ता पक्ष भाजपा को बहुमत से दूर खड़ा कर दिया। कांग्रेस, पं. बंगाल से टीएमसी, एवं उत्तर प्रदेश से सपा का चुनाव में अच्छा प्रदर्शन रहा। इस चुनाव में एनडीए बहुमत का आकड़ा पार कर जीत हासिल कर तो ली, सत्ता बरकरार रह सकती है पर दावपेंच अहंकार की हार हुई है।
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इस लोकसभा चुनाव में सत्ता पक्ष चार सौ पार करने के चुनावी आकड़े को पाने के लिये हर तरह के चुनावी दावपेंच का खुलकर प्रयोग किया। विपक्ष को कमजोर करने के लिये जांच एजेंसियों का खुलकर कानून के नाम पर एकतरफा प्रयोग रहा। कई चरणों में लम्बे समय तक लोकसभा चुनाव संपन्न कराने की प्रक्रिया रही। भ्रष्टाचार के नाम पर अपने को सही एवं विपक्ष को गलत ठहराने की कार्यवही आदि को देश की आवाम ने नकार दिया। चुनाव को प्रभावित करने के लिये देश के धर्माचार्य चारों शंकराचार्यो के मना करने के वावजूद असमय राममंदिर का निर्माण कराया गया। अयोध्या से भाजपा प्रत्याशी की हार हुई। इस तरह के परिवेश ने मोदी के कद को कम कर दिया। फिर भी आज भी मोदी की गांरटी में अहंकार बोल रहा है । एक बार फिर से मोदी सरकार की बात उभर कर सामने आने लगी है। भाजपा का वजूद मोदी नाम में सिमट कर रह गया है। इस तरह का परिवेश सत्ता का एक नया रूप दे सकता है। इस बार कुछ को छोड़कर अधिकांश आ रहे एक्जीट पोल भी गलत साबित हुये
भाजपा के पास सत्ता पर आने के लिये बहुमत का आकड़ा तो नहीं है पर एनडीए के पास वर्तमान में बहुमत का आकड़ा है,। सत्ता का पाला फिलहाल एनडीए के पास है। विपक्ष इंडिया गठबंधन बहुमत से दूर है पर उसकी नजर एनडीए के सहयोगी दल की ओर भी टिकी हुई है। राजनीति में सबकुछ संभव है। ऐसे परिवेश में सत्ता का रंग बदल भी सकता है।
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