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राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस* पर विशेष लेखमनोज कुमार मील अध्यक्ष, उपभोक्ता आयोग झुंझुनूं की कलम से

सरल, सुलभ व त्वरित न्यायउपभोक्ता का संवैधानिक अधिकार

 झुंझुनूं (23 सितंबर 2025)। आज का उपभोक्ता केवल वस्तु या सेवा का क्रेता नहीं है, बल्कि वह अपने अधिकारों के प्रति सजग नागरिक भी है। बदलते समय में बाजार का विस्तार हुआ है, वहीं उपभोक्ताओं के शोषण की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं को सरल, सुलभ और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इसी उद्देश्य को साकार करने के लिए भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 लागू किया गया, जिसने उपभोक्ता अधिकारों को और अधिक मजबूत तथा प्रभावी बनाया है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 38(7) इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह धारा उपभोक्ता आयोगों को शिकायतों के निपटारे के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित करती है। इसके अनुसार, जिन मामलों में वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती, उनमें विरोधी पक्ष को नोटिस मिलने की तारीख से तीन माह के भीतर शिकायत का निपटारा करने का प्रयास किया जाना चाहिए। वहीं, जिन मामलों में वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की आवश्यकता होती है, उनमें यह अवधि पाँच माह निर्धारित की गई है। यह प्रावधान न्यायिक प्रक्रिया को अनावश्यक विलंब से बचाने और उपभोक्ताओं को शीघ्र राहत दिलाने की मंशा को दर्शाता है।

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के अवसर पर यह आवश्यक हो जाता है कि हम इस बात पर आत्ममंथन करें कि उपभोक्ता न्याय प्रणाली कितनी प्रभावी है और आम उपभोक्ता तक इसका लाभ कितनी सहजता से पहुँच रहा है। आज भी अनेक उपभोक्ता अपने अधिकारों से अनजान रहते हैं या न्याय प्रक्रिया को जटिल और समयसाध्य मानकर शिकायत दर्ज कराने से हिचकिचाते हैं। ऐसे में धारा 38(7) जैसे प्रावधान उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने का कार्य करते हैं और यह संदेश देते हैं कि न्याय केवल अधिकार नहीं, बल्कि समयबद्ध अधिकार है।

सरल प्रक्रिया, न्यूनतम औपचारिकताएँ और निर्धारित समय-सीमा—ये तीनों तत्व मिलकर उपभोक्ता न्याय को वास्तव में सुलभ बनाते हैं। ऑनलाइन शिकायत प्रणाली, ई-दाखिल पोर्टल और उपभोक्ता आयोगों की सक्रिय भूमिका ने इस दिशा में सकारात्मक परिवर्तन लाए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि उपभोक्ता स्वयं जागरूक हों, अपने अधिकारों का उपयोग करें और अनुचित व्यापार प्रथाओं के विरुद्ध आवाज उठाएँ।

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि एक जागरूक उपभोक्ता ही सशक्त बाजार और मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला है। जब उपभोक्ता को समय पर न्याय मिलता है, तो न केवल उसका विश्वास प्रणाली में बढ़ता है, बल्कि बाजार में अनुशासन और पारदर्शिता भी स्थापित होती है। अतः सरल, सुलभ और त्वरित न्याय केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि उपभोक्ता सम्मान और सामाजिक न्याय की अनिवार्य शर्त है।

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